3 Oct 2012

खामोश लम्हे..1








एक इंसान जिसने  नैतिकता की  झिझक मे अपने पहले प्यार की आहुती दे दी और जो उम्र भर  उस संताप  को  गले मे डाले, रिस्तों का  फर्ज निभाता चला गया । कभी माँ-बाप  का  वात्सल्य, कभी पत्नी  का प्यार  तो कभी
बच्चो  की ममता  उसके पैरों मे  बेड़ियाँ बने  रहे। मगर
इन सबके  बावजूद वो  उसे कभी  ना भुला सका जो  उसके  दिल के  किसी  कोने  मे सिसक  रही  थी। वक़्त  उसकी झोली  मे  वियोग की तड़प  भरता रहा……








कहाँ आसान है पहली मुहब्बत को भुला देना
बहुत मैंने लहू  थूका है  घरदारी बचाने में
-    मुन्नवर राणा


( मैंने अपना ये लघु उपन्यास मशहूर शायर मुन्नवर राणा साहब के इस शे’र से प्रभावित होकर लिखा है । जहां एक इंसान अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वाहण करते करते अपने पहले प्यार को अतीत की गहराइयों मे विलीन होते देखता रहा। मगर उम्र के ढलती सांझ मेन जाकर जब जिम्मेदारियों से हल्की सी निजात मिली तो दौड़ पड़ा उसे अतीत के अंधकूप से बाहर निकालने को....   
 
विक्रम
(WebSite: www.guglwa.com)





रात अपने पूरे यौवन पर थी। त्रिवेणी एक्सप्रेस अपने गंतव्य को छूने सरपट दौड़ रही थी। सभी यात्री अपनी अपनी बर्थ पे गहरी नींद मे सोये हुये थे मगर एक अधेड़ उम्र शख्स की आंखो मे नींद का नामोनिशान तक नहीं था। चेहरे पर उम्र ने अपने निशान बना दिये थे। जीवन मे लगभग पचपन से ज्यादा बसंत देख चुका निढाल सा अपनी बर्थ पे बैठा ट्रेन की खिड़की से बाहर फैली चाँदनी रात को देख रहा था। जहां दूर दूर तक फैला सन्नाटा इंजन के शोर से तिलमिला कर कुलबुला रहा था। आसमान मे चाँद तारे अपनी हल्की थपकियों से अल्हड़ चाँदनी को लोरियाँ दे रहे थे, जो अंधेरे को अपने आगोश मे ले बेपरवाह सी लेटी हुई थी। कभी-कभी कहीं दूर किसी बिजली के बल्ब की हल्की रोशनी पेड़ों के झुरमुटों से नजर आती थी। उसकी आंखे दूर तक फैली चाँदनी के उस पार अपने अतीत को तलाश रही थी जो वक़्त के लंबे अंतराल मे कहीं दफ़न हो चुका था। वह बार बार अतीत के उन आधे अधूरे दृश्यों को जोड़कर एक सिलसिलेवार श्रींखला बनाने की कोशिश करता मगर वक़्त के बहुत से हिस्से अपना वजूद खो चुके थे। इसी उधेड़बुन मेँ न जाने कब उसके थक चुके मस्तिष्क को नींद ने अपने आगोश मे ले बाहर पसरी चाँदनी से प्रतिस्पर्धा शुरू करदी। ट्रेन लोगों को उनकी मंजिल तक पहुँचाने के लिए बेरहमी से पटरियों का सीना रोंदती बेतहाशा भाग रही थी।

बीस वर्षीय भानु अपने बड़े भाई के साथ अपने कॉलेज दाखिले के लिए अनुपगढ़ आया था। पहली बार गाँव से शहर मे पढ़ने आया भानु शहर की चहल-पहल से बहुत प्रभावित हुआ । भानु के बड़े भाई का अनुपगढ़ मे तबादला हो गया था तो उन्होने भानु को भी अपने पास पढ़ने बुला लिया । बारहवीं तक गाँव मे पढ़ा भानु आगे की पढ़ाई के लिए शहर आया था । हालांकि उसके भाई को सरकारी आवास मिला था मगर वह भानु के कॉलेज से काफी दूर होने के कारण, उसके बड़े भाई विजय ने उसके कॉलेज से मात्र एक किलोमीटर दूर रेलवे कॉलोनी मे, अपने एक दोस्त के खाली पड़े क्वार्टर मे उसके रहने का प्रबंध कर दिया था । दूर तक फैले रेलवे के दो मंज़िला अपार्टमेंट्स में करीब सत्तर ब्लॉक थे और हर ब्लॉक मे आठ परिवार रह सकते थे। जिसमे चार ग्राउंडफ्लोर पे पाक्तिबद्ध बने थे और चार पहली मंजिल पे, जिनके दरवाजे सीढ़ियों में एक दूसरे के आमने सामने खुलते थे । पहली मंजिल मे दो बैडरूम का मकान उस अकेले के लिए काफी बड़ा था। पहले दिन भानु ने पूरे मकान का जायजा लिया , रसोई मे खाना बनाने के लिए जरूरी बर्तन, स्टोव और कोयले की अंगीठी तक का इंतजाम था। भानु अपने घर मे माँ के काम मे हाथ बंटाते बंटाते खाना बनाना सीख गया था। रसोई के आगे बरामदा और बरामदे के दूसरे सिरे और मुख्य दरवाजे के दायें तरफ स्नानघर था जिसके नल से टिप टिप टपकता पानी, टूट कर झूलता हुआ फव्वारा और कोनों मे जमी काई से चिपके कॉकरोच, उसे सरकारी होने का प्रमाणपत्र दे रहे थे।

एक पूरा दिन भानु को उस मकान को रहने लायक बनाने मे ही लगाना पड़ा। शाम को बाजार से दैनिक उपयोग की चीजें खरीद लाया। रात को देर तक सभी जरूरी काम निपटा कर सो गया। पहली रात अजनबी जगह नींद समय पे और ठीक से नहीं आती । अगली सुबह देर से उठा , हालांकि आज रविवार था , इसलिए कॉलेज की भी छुट्टी थी।


शयनकक्ष मे बनी खिड़की से सामने दूर दूर तक रेलवे लाइनों का जाल फैला हुआ था। आस पास के क्वार्ट्स मे रहने वाले बच्चे, रेलवे लाइन्स और अपार्टमेंट्स बीच सामने की तरफ बने पार्क मे खेल रहे थे जो भानु के अपार्टमेंट के ठीक सामने था। बच्चो के शोरगुल को सुनकर भानु की आँख खुल गई थी। अपार्टमेंट के दायें और बरगद का पुराना पेड़ बरसों से अपनी विशाल शाखाओं पर विभिन्न प्रजाति के अनेकों पक्षियों का आशियाना बनाए हुआ था। उसकी काली पड़ चुकी छाल उसके बुढ़ा होने की चुगली खा रही थी। बरसात के दिनों मे उसके चारों तरफ पानी भर जाता था , जिसमे कुछ आवारा पशु कभी कभार जल क्रीडा करने आ धमकते और उसी दौरान पेड़ के पक्षी उनकी पीठ पर सवार हो नौकायन का लुत्फ उठा लेते थे। पार्क मे कुछ बुजुर्ग भी टहल रहे थे। पूरी ज़िंदगी भाग-दौड़ मे गुजारने के बाद बुढ़ापे मे बीमारियाँ चैन से बैठने नहीं देती। मगर कॉलोनी की कुछ औरतें आराम से इकट्ठी बैठकर फुर्सत से बतिया रही थी। उनकी कानाफूसी से लगता था की वो कम से देश या समाज जैसे गंभीर मुद्दो पे तो बिलकुल बात नहीं कर रही थी। हफ्ते मे एक संडे ही तो मिलता है उनको, अगर उसे भी गंभीर मुद्दो मे जाया कर दिया तो फिर क्या फायदा। बीच बीच मे उनके बच्चे चीखते चिल्लाते उनके पास एक दूसरे की शिकायत लेकर आ जाते मगर वो उन्हे एक और धकिया कर फिर से अपनी कानाफूसी मे लग जाती। अपार्टमेंटों के आगे पीछे और मध्य बनी सडकों पे अखबार ,सब्जी, और दूधवाले अपनी रोज़मर्रा की भागदौड़ मे लगे थे।
 

भानु ने दैनिक क्रियायों से निपट कर अपने लिए चाय बनाई और कप हाथ मे लिए रसोई और बाथरूम के मध्य बने बरामदे मे आकर खड़ा हो गया। बरामदे मे पीछे की तरफ लोहे की ग्रिल लगी थी जिसमे से पीछे का अपार्टमेंट पूरा नजर आता था। कोतूहलवश वो नजर आने वाले हर एक मकान के खिड़की दरवाजों से मकान मे रहने वालों को देख रहा था। एक दूसरे अपार्टमेंट्स के बीचो-बीच सड़क पे बच्चे खेल रहते थे। ये सड़के यातायात के लिए नही थी इन्हे सिर्फ अपार्टमेंट्स मे रहने वाले इस्तेमाल करते थे। भानु लिए ये सब नया था। ये मकान, शहर यहाँ के लोग सब कुछ नया था। उसका मकान ऊपर "ए" अपार्टमेंट मे था और ठीक उसके पीछे "बी" अपार्टमेंट था, उसके पीछे सीऔर इस तरह दस अपार्टमेंट की एक शृंखला थी और फिर इसी तरह दाईं तरफ दस दस अपार्टमेंट की अन्य शृंखलाएँ थी। नए लोग नया शहर उसके लिए सबकुछ अजनबी था। बीस वर्षीय भानु आकर्षक कदकाठी का युवक था। उसके व्यक्तित्व से कतई आभास नहीं होता था की, ये एक ग्रामीण परिवेश मे पला-बढ़ा युवक है।
 

भानु चाय की चुसकियों के बीच जिज्ञासावश आस पास के नजारे देखने लगा। चाय खतम करने के बाद वो वहीं खड़ा रहा और सोचता रहा की कितना फर्क है गाँव और शहर की जीवन शैली में। गाँव मे हम हर एक इंसान को भलीभाँति जानते है, हर एक घर मे आना जाना रहता है। अपने घर से ज्यादा वक़्त तो गाँव मे घूमकर और गाँव के अन्य घरों मे गुजरता है। बहुत अपनापन है गाँव मे। इधर हर कोई अपने आप मे जी रहा है। यहाँ सब पक्षियों के भांति अपने अपने घोंसलों मे पड़े रहते हैं। किसी को किसी के सुख-दुख से कोई सरोकार नही। सामने के अपार्टमेंट मे बने मकानों की खुली खिड़कीयों और बालकोनी से घर मे रहने वाले लोग इधर उधर घुमते नजर आ रहे थे। अचानक भानु को अहसास हुआ की कोई बार बार उसकी तरफ देख रहा है, उसने इसे अपना भ्रम समझा और सिर को झटक कर दूसरी तरफ देखने लगा। थोड़े अंतराल के बाद उसका शक यकीन में बदल गया की दो आंखे अक्सर उसे रह रह कर देख रही हैं। उसने दो चार बार उड़ती सी नजर डालकर अपने विश्वास को मजबूत किया।

  
 
 




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( 1985, CD BURN, FACEBOOK, RANJANA, RANJNA, VIKRAM, WINDOWS 8 , DURGA , SURATGARH , DURGA , GUGLWA , GUGALWA, SADULPUR , CHURU , RAJASTHAN PATRIKA  )






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एक इंसान जिसने  नैतिकता की  झिझक मे अपने पहले प्यार की आहुती दे दी और जो उम्र भर  उस संताप  को  गले मे डाले, रिस्तों का  फर्ज निभाता चला गया । कभी माँ-बाप  का  वात्सल्य, कभी पत्नी  का प्यार  तो कभी
बच्चो  की ममता  उसके पैरों मे  बेड़ियाँ बने  रहे। मगर
इन सबके  बावजूद वो  उसे कभी  ना भुला सका जो  उसके  दिल के  किसी  कोने  मे सिसक  रही  थी। वक़्त  उसकी झोली  मे  वियोग की तड़प  भरता रहा……








कहाँ आसान है पहली मुहब्बत को भुला देना
बहुत मैंने लहू  थूका है  घरदारी बचाने में
-    मुन्नवर राणा


( मैंने अपना ये लघु उपन्यास मशहूर शायर मुन्नवर राणा साहब के इस शे’र से प्रभावित होकर लिखा है । जहां एक इंसान अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वाहण करते करते अपने पहले प्यार को अतीत की गहराइयों मे विलीन होते देखता रहा। मगर उम्र के ढलती सांझ मेन जाकर जब जिम्मेदारियों से हल्की सी निजात मिली तो दौड़ पड़ा उसे अतीत के अंधकूप से बाहर निकालने को....   
 
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रात अपने पूरे यौवन पर थी। त्रिवेणी एक्सप्रेस अपने गंतव्य को छूने सरपट दौड़ रही थी। सभी यात्री अपनी अपनी बर्थ पे गहरी नींद मे सोये हुये थे मगर एक अधेड़ उम्र शख्स की आंखो मे नींद का नामोनिशान तक नहीं था। चेहरे पर उम्र ने अपने निशान बना दिये थे। जीवन मे लगभग पचपन से ज्यादा बसंत देख चुका निढाल सा अपनी बर्थ पे बैठा ट्रेन की खिड़की से बाहर फैली चाँदनी रात को देख रहा था। जहां दूर दूर तक फैला सन्नाटा इंजन के शोर से तिलमिला कर कुलबुला रहा था। आसमान मे चाँद तारे अपनी हल्की थपकियों से अल्हड़ चाँदनी को लोरियाँ दे रहे थे, जो अंधेरे को अपने आगोश मे ले बेपरवाह सी लेटी हुई थी। कभी-कभी कहीं दूर किसी बिजली के बल्ब की हल्की रोशनी पेड़ों के झुरमुटों से नजर आती थी। उसकी आंखे दूर तक फैली चाँदनी के उस पार अपने अतीत को तलाश रही थी जो वक़्त के लंबे अंतराल मे कहीं दफ़न हो चुका था। वह बार बार अतीत के उन आधे अधूरे दृश्यों को जोड़कर एक सिलसिलेवार श्रींखला बनाने की कोशिश करता मगर वक़्त के बहुत से हिस्से अपना वजूद खो चुके थे। इसी उधेड़बुन मेँ न जाने कब उसके थक चुके मस्तिष्क को नींद ने अपने आगोश मे ले बाहर पसरी चाँदनी से प्रतिस्पर्धा शुरू करदी। ट्रेन लोगों को उनकी मंजिल तक पहुँचाने के लिए बेरहमी से पटरियों का सीना रोंदती बेतहाशा भाग रही थी।

बीस वर्षीय भानु अपने बड़े भाई के साथ अपने कॉलेज दाखिले के लिए अनुपगढ़ आया था। पहली बार गाँव से शहर मे पढ़ने आया भानु शहर की चहल-पहल से बहुत प्रभावित हुआ । भानु के बड़े भाई का अनुपगढ़ मे तबादला हो गया था तो उन्होने भानु को भी अपने पास पढ़ने बुला लिया । बारहवीं तक गाँव मे पढ़ा भानु आगे की पढ़ाई के लिए शहर आया था । हालांकि उसके भाई को सरकारी आवास मिला था मगर वह भानु के कॉलेज से काफी दूर होने के कारण, उसके बड़े भाई विजय ने उसके कॉलेज से मात्र एक किलोमीटर दूर रेलवे कॉलोनी मे, अपने एक दोस्त के खाली पड़े क्वार्टर मे उसके रहने का प्रबंध कर दिया था । दूर तक फैले रेलवे के दो मंज़िला अपार्टमेंट्स में करीब सत्तर ब्लॉक थे और हर ब्लॉक मे आठ परिवार रह सकते थे। जिसमे चार ग्राउंडफ्लोर पे पाक्तिबद्ध बने थे और चार पहली मंजिल पे, जिनके दरवाजे सीढ़ियों में एक दूसरे के आमने सामने खुलते थे । पहली मंजिल मे दो बैडरूम का मकान उस अकेले के लिए काफी बड़ा था। पहले दिन भानु ने पूरे मकान का जायजा लिया , रसोई मे खाना बनाने के लिए जरूरी बर्तन, स्टोव और कोयले की अंगीठी तक का इंतजाम था। भानु अपने घर मे माँ के काम मे हाथ बंटाते बंटाते खाना बनाना सीख गया था। रसोई के आगे बरामदा और बरामदे के दूसरे सिरे और मुख्य दरवाजे के दायें तरफ स्नानघर था जिसके नल से टिप टिप टपकता पानी, टूट कर झूलता हुआ फव्वारा और कोनों मे जमी काई से चिपके कॉकरोच, उसे सरकारी होने का प्रमाणपत्र दे रहे थे।

एक पूरा दिन भानु को उस मकान को रहने लायक बनाने मे ही लगाना पड़ा। शाम को बाजार से दैनिक उपयोग की चीजें खरीद लाया। रात को देर तक सभी जरूरी काम निपटा कर सो गया। पहली रात अजनबी जगह नींद समय पे और ठीक से नहीं आती । अगली सुबह देर से उठा , हालांकि आज रविवार था , इसलिए कॉलेज की भी छुट्टी थी।


शयनकक्ष मे बनी खिड़की से सामने दूर दूर तक रेलवे लाइनों का जाल फैला हुआ था। आस पास के क्वार्ट्स मे रहने वाले बच्चे, रेलवे लाइन्स और अपार्टमेंट्स बीच सामने की तरफ बने पार्क मे खेल रहे थे जो भानु के अपार्टमेंट के ठीक सामने था। बच्चो के शोरगुल को सुनकर भानु की आँख खुल गई थी। अपार्टमेंट के दायें और बरगद का पुराना पेड़ बरसों से अपनी विशाल शाखाओं पर विभिन्न प्रजाति के अनेकों पक्षियों का आशियाना बनाए हुआ था। उसकी काली पड़ चुकी छाल उसके बुढ़ा होने की चुगली खा रही थी। बरसात के दिनों मे उसके चारों तरफ पानी भर जाता था , जिसमे कुछ आवारा पशु कभी कभार जल क्रीडा करने आ धमकते और उसी दौरान पेड़ के पक्षी उनकी पीठ पर सवार हो नौकायन का लुत्फ उठा लेते थे। पार्क मे कुछ बुजुर्ग भी टहल रहे थे। पूरी ज़िंदगी भाग-दौड़ मे गुजारने के बाद बुढ़ापे मे बीमारियाँ चैन से बैठने नहीं देती। मगर कॉलोनी की कुछ औरतें आराम से इकट्ठी बैठकर फुर्सत से बतिया रही थी। उनकी कानाफूसी से लगता था की वो कम से देश या समाज जैसे गंभीर मुद्दो पे तो बिलकुल बात नहीं कर रही थी। हफ्ते मे एक संडे ही तो मिलता है उनको, अगर उसे भी गंभीर मुद्दो मे जाया कर दिया तो फिर क्या फायदा। बीच बीच मे उनके बच्चे चीखते चिल्लाते उनके पास एक दूसरे की शिकायत लेकर आ जाते मगर वो उन्हे एक और धकिया कर फिर से अपनी कानाफूसी मे लग जाती। अपार्टमेंटों के आगे पीछे और मध्य बनी सडकों पे अखबार ,सब्जी, और दूधवाले अपनी रोज़मर्रा की भागदौड़ मे लगे थे।
 

भानु ने दैनिक क्रियायों से निपट कर अपने लिए चाय बनाई और कप हाथ मे लिए रसोई और बाथरूम के मध्य बने बरामदे मे आकर खड़ा हो गया। बरामदे मे पीछे की तरफ लोहे की ग्रिल लगी थी जिसमे से पीछे का अपार्टमेंट पूरा नजर आता था। कोतूहलवश वो नजर आने वाले हर एक मकान के खिड़की दरवाजों से मकान मे रहने वालों को देख रहा था। एक दूसरे अपार्टमेंट्स के बीचो-बीच सड़क पे बच्चे खेल रहते थे। ये सड़के यातायात के लिए नही थी इन्हे सिर्फ अपार्टमेंट्स मे रहने वाले इस्तेमाल करते थे। भानु लिए ये सब नया था। ये मकान, शहर यहाँ के लोग सब कुछ नया था। उसका मकान ऊपर "ए" अपार्टमेंट मे था और ठीक उसके पीछे "बी" अपार्टमेंट था, उसके पीछे सीऔर इस तरह दस अपार्टमेंट की एक शृंखला थी और फिर इसी तरह दाईं तरफ दस दस अपार्टमेंट की अन्य शृंखलाएँ थी। नए लोग नया शहर उसके लिए सबकुछ अजनबी था। बीस वर्षीय भानु आकर्षक कदकाठी का युवक था। उसके व्यक्तित्व से कतई आभास नहीं होता था की, ये एक ग्रामीण परिवेश मे पला-बढ़ा युवक है।
 

भानु चाय की चुसकियों के बीच जिज्ञासावश आस पास के नजारे देखने लगा। चाय खतम करने के बाद वो वहीं खड़ा रहा और सोचता रहा की कितना फर्क है गाँव और शहर की जीवन शैली में। गाँव मे हम हर एक इंसान को भलीभाँति जानते है, हर एक घर मे आना जाना रहता है। अपने घर से ज्यादा वक़्त तो गाँव मे घूमकर और गाँव के अन्य घरों मे गुजरता है। बहुत अपनापन है गाँव मे। इधर हर कोई अपने आप मे जी रहा है। यहाँ सब पक्षियों के भांति अपने अपने घोंसलों मे पड़े रहते हैं। किसी को किसी के सुख-दुख से कोई सरोकार नही। सामने के अपार्टमेंट मे बने मकानों की खुली खिड़कीयों और बालकोनी से घर मे रहने वाले लोग इधर उधर घुमते नजर आ रहे थे। अचानक भानु को अहसास हुआ की कोई बार बार उसकी तरफ देख रहा है, उसने इसे अपना भ्रम समझा और सिर को झटक कर दूसरी तरफ देखने लगा। थोड़े अंतराल के बाद उसका शक यकीन में बदल गया की दो आंखे अक्सर उसे रह रह कर देख रही हैं। उसने दो चार बार उड़ती सी नजर डालकर अपने विश्वास को मजबूत किया।

  
 
 




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